बोले जौनपुर : खेतों से भागें घड़रोज और मंडी में सफाई हो हर रोज
Jaunpur News - चाचकपुर फूल मंडी के किसान और व्यापारी विभिन्न समस्याओं का सामना कर रहे हैं। उन्हें खेतों की सुरक्षा, नियमित सफाई, शौचालय और पार्किंग की आवश्यकता है। घड़रोज के कारण फूलों की बर्बादी हो रही है और कोल्ड...
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अंग्रेजों के जमाने की चाचकपुर फूल मंडी को गुलजार करने वाले किसान और कारोबारी तनाव में हैं। वे चाहते हैं कि खेतों को घड़रोज-नीलगायों से सुरक्षा मिले, मंडी में रोज सफाई हो, साथ में एक शौचालय भी बन जाए। मंडी में रोज आने वाले हजार से अधिक खरीदार और विक्रेता परिवहन के दौरान किराये में छूट भी चाहते हैं। उनका कहना है कि फिर आजमगढ़, भदोही, मिर्जापुर-विंध्याचल तक कारोबार अधिक सुगम हो जाएगा। फूलों की खरीद-बिक्री का आंकड़ा भी कुछ लाख से कई लाख में तब्दील होता दिखेगा। चाचकपुर फूल मंडी कभी इत्र उद्योग का केंद्र थी। आज कई गंभीर समस्याओं से जूझ रही है। किसान और व्यापारी सुबह पांच बजे से मंडी में फूलों की खरीद-बिक्री के लिए जुटने लगते हैं। यहां हर रोज अव्यवस्था का माहौल रहता है। पार्किंग और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधा की कमी से भारी परेशानी होती है। मंडी में बेहतर प्रबंधन के साथ कोल्ड स्टोरेज की सुविधा मिल जाए तो फूल के कारोबारियों की जिंदगी सुगंधित हो सकती है। मंडी में ‘हिन्दुस्तान के साथ बातचीत में उन्होंने अपनी समस्याओं का पिटारा खोला। उनका कहना है कि घड़रोज से बहुत हानि हो रही है। सिंचाई की समस्या और यात्री वाहनों के किराए ने भी उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
पार्किंग न शौचालय, सुरक्षा भी नहीं
अखिलेश मौर्या उर्फ स्वामीजी ने कहा कि मंडी में सुबह पांच बजे से किसान और कारोबारी आने लगते हैं। सुबह 10 बजे तक यहां भीड़ रहती है, लेकिन इस परिसर में न पार्किंग की व्यवस्था है, न ही शौचालय की। गाड़ियां बेतरतीब खड़ी हो जाती हैं। जब स्कूलों की वैन आती हैं तो पूरी मंडी जाम हो जाती है। सड़क पर गाड़ी खड़ी करने से रोकने पर लोग कहते हैं, बस 2 मिनट की ही बात है। फिर बेतरतीब ढंग से वाहनों की कतार लग जाती है। स्वामी जी ने कहा कि प्रशासन यहां एक-दो होमगार्ड के जवान तैनात करे, जो गाड़ियों को सड़क पर खड़ा होने से रोकें। हृदयनाथ कुशवाहा ने कहा कि सुबह यहां 1000 से ज्यादा लोगों की भीड़ होती है, लेकिन एक शौचालय नहीं है। महिलाओं के लिए यह समस्या अधिक गंभीर है। पुरुष बाइक से सिपाह चौराहे तक चले जाते हैं, लेकिन महिलाओं के पास कोई विकल्प नहीं होता। अगर नाले के पास ही शौचालय बना दिया जाए तो काफी राहत मिलेगी। प्रकाशचंद कुशवाहा ने कहा कि सुबह मंडी में गाड़ियों के बेतरतीब खड़ा होने से पैदल चलना मुश्किल हो जाता है। स्कूल वैन के हॉर्न अलग डिस्टर्ब कर देते हैं। रामराज मौर्य ने कहा कि चाचकपुर मंडी का वजूद बचाने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए।
व्यापारी खुद लगाते हैं झाड़ू
फूल व्यापारी अखिलेश कुमार, योगेश, धीरज ने बताया कि फूल मंडी में नगर पालिका की ओर से नियमित सफाई का इंतजाम नहीं है। हम लोग ही खुद झाड़ू लगाते हैं और कूड़ा उठाकर कूड़ेदान में डालते हैं। कूड़ा गाड़ी भी रोज नहीं आती। दो तीन ट्रैक्टर कूड़ा जमा हो जाता है तो सप्ताह में किसी एक दिन गाड़ी जाएगी और कूड़ा उठाकर ले जाएगी। मंडी में रोज सफाई की व्यवस्था होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब पास के मुहल्लों में सुबह-शाम झाड़ू लगती है तो इस मंडी में एक बार सफाई क्यों नहीं कराई जा सकती।
फूलों को बर्बाद कर रहे घड़रोज
धीरज मौर्य ने कहा कि गुलाब, बेला, कुंद, गेंदा, गुलदाऊदी जैसे फूलों को घड़रोज बर्बाद कर रहे हैं। कामिनी और टंगारी को छोड़ बाकी फूल सुरक्षित नहीं रहते। हमने खेतों को कटीले तार, बांस और जाली से घेर रखा है, लेकिन घड़रोज का झुंड रात में आकर सब नष्ट कर देता है। अब वे किसानों पर भी हमला करने लगे हैं। इसका कोई स्थायी समाधान होना चाहिए। योगेश कुमार मौर्य ने कहा कि पहले घड़रोज फूल नहीं खाते थे, लेकिन पिछले 2-3 साल से वे फूलों को भी नष्ट करने लगे हैं। गुलाब के फूल में कांटे होते हैं, लेकिन वे उन्हें भी नहीं छोड़ते। इससे बहुत नुकसान हो रहा है। रंजीत बिंद ने कहा कि आक्रामक घड़रोज किसी भी नियंत्रण में नहीं आते।
कोल्ड स्टोरेज न होने से नुकसान
कुलवंत सिंह ने कहा कि फूल एक कच्चा सौदा है। न बिक पाने की स्थिति में वे खराब हो जाते हैं। शहर के कोल्ड स्टोरेज में फूल रखने की लागत बहुत ज्यादा है। अगर स्थानीय स्तर पर एक छोटा कोल्ड स्टोरेज बनवा दिया जाए तो कारोबारी बचे हुए फूलों को अगले दिन तक सुरक्षित रख सकेंगे। इससे नुकसान कम होगा। लालजी मौर्य ने बताया कि कई बार हम 10 रुपये का माल खरीदकर लाते हैं, लेकिन कभी उसे पांच रुपये में भी बेचने को विवश होते हैं। कई बार फूल-मालाएं कूड़े में भी चली जाती हैं। आनंद ने बताया कि हम अतिरिक्त फूलों को कानपुर और लखनऊ की मंडियों में भेजते हैं, लेकिन रोडवेज का किराया तय नहीं है। 40 किलो फूल के एक कार्टून का किराया 600 से 700 रुपये तक लिया जाता है। अगर रेलवे की ओर से ट्रेनों में एक अतिरिक्त एसी कोच लगे तो हम दूर की मंडियों तक आसानी से फूल पहुंचा सकेंगे।
मिनी ट्यूबवेल की जरूरत
योगेश मौर्य ने बताया कि फूलों की खेती में पानी बहुत लगता है। जिनके पास सबमर्सिबल पंप है, उनसे हमें 80 से 100 रुपये प्रति घंटे के हिसाब से पानी मिलता है, लेकिन छोटी मशीन के कारण पानी भरपूर नहीं आता। सरकार अगर मिनी ट्यूबवेल लगवा दे तो किसानों को काफी राहत मिलेगी।
सुझावः
ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार हो, होमगार्ड की तैनाती हो और पार्किंग की उचित व्यवस्था की जाए ताकि जाम की समस्या न रहे।
सार्वजनिक शौचालय का निर्माण हो। स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया देने से व्यापारी और ग्राहक असुविधा से बच सकेंगे।
नगरपालिका को चाचकपुर मंडी में नियमित सफाई करानी चाहिए। यहां कूड़ा भी रोज उठाने का इंतजाम हो।
सरकार को मंडी में छोटा कोल्ड स्टोरेज बनवाना चाहिए ताकि फूलों की ताजगी बनी रहे और व्यापारियों को नुकसान न हो।
प्रशासन के प्रयास से फूलों के परिवहन के लिए निश्चित किराया तय होना चाहिए ताकि व्यापारियों को आर्थिक बोझ न उठाना पड़े।
शिकायतें:
मंडी में सुबह पांच से दस बजे तक भीषण जाम लगता है जिससे व्यापार में देरी होती है और फूलों की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
मंडी में हजारों लोग प्रतिदिन आते हैं लेकिन शौचालय न होने से व्यापारी और ग्राहक असुविधा झेलते हैं, खासकर महिलाएं।
चाचकपुर फूल मंडी में नियमित झाड़ू नहीं लगती, यहां के कारोबारी ही झाड़ू लगाकर कूड़ा कूड़ेदान में डालते हैं।
मंडी में भंडारण सुविधा न होने के कारण फूल जल्दी खराब हो जाते हैं। व्यापारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
रोडवेज बसों में फूल परिवहन का निश्चित किराया तय नहीं होने से व्यापारी परेशान होते हैं।
बोले कारोबारी
चाचकपुर फूल मंडी में शौचालय न होने से ग्राहक और व्यापारी परेशान होते हैं।
-अखिलेश कुमार मौर्य
फूल के किसान नीलगाय से बहुत परेशान हैं। उनसे छुटकारा मिले तो बात बने।
-धीरज कुमार
स्थानीय स्तर पर भंडारण सुविधा न होने के कारण रोज भारी मात्रा में फूल सूख जाते हैं।
-कुलवंत सिंह
मंडी या आस पास कोल्डस्टोरेज की सुविधा नहीं है, इससे किसान और दुकानदार को नुकसान होता है।
-हृदयनाथ कुशवाहा
नीलगाय फूल की फसल चौपट कर दे रही हैं। इस समस्या से छुटकारा मिलना चाहिए।
-राकेश मौर्य
आजादी के पहले की फूल मंडी को आज तक शौचालय की सुविधा नहीं मिल सकी है।
-प्रकाश चंद्र कुशवाहा
शौचालय न होने के कारण यहां के कारोबारियों को एक किमी दूर सिपाह चौराहा जाना पड़ता है।
-सभाजीत बिंद
मंडी में फूल का रेट निश्चित नहीं रहता। ग्राहकों की संख्या के आधार पर रेट तय होता है।
-आनंद
फूल कारोबार में अब मुनाफा नहीं रहा। इसे बचाने के लिए सरकार को सब्सिडी देनी चाहिए।
-योगेश कुमार मौर्य
लोग अब सजावट में आर्टिफिशियल फूलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसका भी असर पड़ रहा है।
-सत्यम यादव
नवरात्र और शादी के समय फूल कारोबार अच्छा चलता है। बाकी दिनों में धंधा मंदा ही रहता है।
-संदीप
कई बार 10 रुपये की माला पांच रुपये में बेचना पड़ता है। तब भी माला नहीं बिकी तो नुकसान बढ़ जाता है।
-भवानी प्रसाद
फूल मंडी में पार्किंग की व्यवस्था नहीं है। बेतरतीब गाड़ियों से पूरी मंडी जाम हो जाती है।
-बृजेश यादव
फूल भंडारण के लिए कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था हो जाए तो कारोबारी हानि से बच जाएंगे।
-आदेश माली
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