बोले बहराइच -बालश्रम रोकने के लिए सामाजिक जागरूकता जरूरी
Bahraich News - तराई में बालश्रम एक गंभीर समस्या बन गई है। 10 से 12 साल के बच्चे पढ़ाई की उम्र में होटलों में काम करने के लिए मजबूर हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बालश्रम में कमी का दावा किया गया है, लेकिन वास्तविकता...

तराई के माथे पर बालश्रम भी एक कलंक है। पढ़ने-लिखने व खेलने की उम्र में नौनिहाल गृहस्थी चलाने के लिए होटलों पर जूठन साफ करने को मजबूर हो रहे हैं। शहर से लेकर कस्बों तक जिधर नजर दौड़ाइए उधर 10 से 12 साल के उम्र के बच्चे काम करते नजर आ रहे हैं। हालांकि बालश्रम रोकने को लेकर श्रम विभाग समेत कई निजी संस्थाएं भी काम कर रही हैं, लेकिन बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ही बच्चों से श्रम कराने में हिचकिचाते नहीं हैं। जब तक सामाजिक जागरूकता नहीं होगी तराई का भविष्य यूं ही सुधर नहीं पाएगा। बहराइच, संवाददाता।
तराई के लिए बालश्रम एक अभिशाप बन गया है। सरकारी आंकड़े भले ही बालश्रम के बढ़ते ग्राफ में अंकुश का दावा कर रहे हों, लेकिन हकीकत इससे उलट है। शिक्षा के प्रति अभिभावकों का रवैया, परिवार की आर्थिं स्थिति न केवल परिवार के बड़ों बल्कि अबोध बच्चों को भी मजदूरी करने के लिए विवश कर रही है। यह हाल तब है जब शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत बच्चों को मुफ्त शिक्षा मुहैया कराया जा रहा है बावजूद तराई में पढ़ने-लिखने की उम्र में बच्चे होटलों, ढाबों, रेस्टोरेंट, परचून की दुकानों से लेकर बिल्डिंग निर्माण में खतरनाक काम करते दिख रहे हैं। जिम्मेदार विभाग जागरूकता व बालश्रम रोकने की दिशा में सरकारी आंकड़ों को दुरुस्त करने के लिए प्रतिष्ठानों पर छापेमारी करता रहा, लेकिन बच्चों से श्रम कराने वाले दुकानदारों पर कार्रवाई के नाम पर चेतावनी या फिर मामूली जुर्माना तक ही कदम उठ पा रहे हैं। हालांकि पिछले कुछ सालों में सरकारी योजनाओं और विभागीय अधिकारियों की सक्रियता से बालश्रम कराने वाले लोगों में डर पैदा हुआ है, लेकिन यह अभी नाकाफी है। श्रम विभाग की ओर से बाल श्रमिकों के उत्थान के लिए कई योजनाएं संचालित हो रही हैं। माता-पिता की मृत्यु होने पर विभाग बीमित श्रमिकों के बच्चों को 5.25 लाख रुपए की आर्थिक मुहैया कराने का दावा किया जा रहा है। निजी संस्थानों से भी बाल श्रमिक के अभिभावकों को उपकरण व संसाधन मुहैया कराया जा रहा है ताकि आर्थिक उन्नयन कर बच्चों की शिक्षा के प्रति वे जागरूक हो सकें, लेकिन इन योजनाओं का लाभ पाना बाल श्रमिक व उन अभिभावकों के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। जटिल प्रक्रिया की वजह से वे कदम खींच ले रहे हैं। दरअसल बाल मजदूरी हमारे समाज का वो कड़वा सच है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। बचपन इंसान की जिंदगी का सबसे हसीन पल होता है। बचपन में न किसी बात की चिंता होती है और न किसी का डर, लेकिन हर इंसान को बचपन में यह पल नसीब हो, यह संभव नहीं है। कुछ लोगों का बचपन गरीबी में पेट भरने की जद्दोजहद में काम के बोझ तले दबकर रह जाता है। जिले के कई ढाबों, होटलों और दुकानों समेत अन्य जगहों पर छोटे -छोटे बच्चों को बाल मजदूरी में पिसते हुए देखा जा सकता है। इनमें तमाम बच्चे ऐसे हैं, जिनके अभिभावक लाचार हैं। वे काम नहीं कर सकते हैं। दो वक्त की रोटी के लिए जद्दोजहद करने को मजबूर मासूम बच्चों की मजबूरी का सौदा चंद रुपयों में होता है। कारखाना, होटल, दुकाने, रेस्टोरेंट आदि के संचालक प्रतिदिन 50 से 100 रुपये देकर मासूम बच्चों से दिन भर काम लेते हैं। इतना ही नहीं बाल श्रमिकों का शारीरिक व मानसिक शोषण भी किया जाता है।
एक साल में 125 प्रतिष्ठानों पर श्रम विभाग ने की छापेमारी
जिला श्रम अधिकारी रिजवान अहमद बताते हैं कि बालश्रम कानूनन अपराध है। इस अपराध को करने वाले प्रतिष्ठानों के संचालकों पर श्रम विभाग कड़ी कार्रवाई कर रहा है। अब तक 125 प्रतिष्ठानों पर छापेमारी की गई है। यहां काम करने वाले नौनिहालों का रेस्क्यू किया गया है। इन बच्चों के अभिभावकों से संवाद कर बच्चों को स्कूलों में दाखिला कराने के साथ ही परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए विभिन्न विभागों में संचालित जन कल्याणकारी योजनाओं से आच्छादित करने की पहल की गई, जिसका नतीजा है कि बच्चों का शैक्षिक पुनर्वास हो रहा है। आर्थिक पुनर्वास की दिशा में भी तेजी से कदम बढ़ाया जा रहा है, ताकि बच्चों से मजदूरी कराने से पहले अभिभावक उनके भविष्य की भी चिंता कर सकें।
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होटलों पर जूठन साफ करते मिले 151 बच्चे
जिम्मेदार भले ही बालश्रम पर अंकुश का दावा कर रहें, लेकिन श्रम विभाग की रिपोर्ट पर नजर डालें तो नेपाल सीमा से लगे बहराइच जिले में बाल श्रमिकों की संख्या में अपेक्षित कमी नहीं आ रही है। छापेमारी के दौरान 72 बच्चे ऐसी जगहों पर काम करते पाए गए, जहां जरा सी चूक उनकी जिंदगी खतरें में डाल सकती है। जबकि 79 बच्चे परचून, किराना व अन्य दुकानों पर काम करते छुड़ाए गए हैं। इन बच्चों का रेस्क्यू कर मेडिकल कराया गया। सीडब्ल्यूसी के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जहां उन्हें अभिभावकों के सुपुर्द कर दियाग या। चिह्नित बच्चों के शैक्षिक पुनर्वास के लिए बेसिक विभाग से संवाद कर स्कूलों में इनका दाखिला कराया गया, ताकि शिक्षा ग्रहण कर ये बच्चे भी अपने भविष्य को संवार सकें। इन बच्चों के शैक्षिक गतिविधियों पर श्रम विभाग के अलावा शिक्षा विभाग भी नजर रख रहा है।
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शिक्षा की मुख्य धारा से जुड़े 40 बाल श्रमिक
पढ़ाई की उम्र में होटलों व ढाबों पर काम करने वाले 40 बच्चों को श्रम विभाग ने बाल श्रमिक होने से बचाया है। इन बच्चों के अभिभावकों से संवाद कर इन्हें बाल श्रमिक विद्या योजना से जोड़ा गया है। जिसका नजीता है कि ये बच्चे अब शिक्षा की मुख्य धारा से जुड़कर अपना भविष्य संवार रहे हैं। जिला श्रम अधिकारी के मुताबिक इन बच्चों को प्रतिमाह 12 से 15 सौ रुपए प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। जिले में कुल बच्चों पर 1.42 लाख रुपए बजट खर्च हो रहा है। इसके अलावा इन्हें शिक्षा सहायता योजना व अन्य योजनाओं से भी लाभान्वित किया जा रहा है।
चाइल्ड लाइन ने रोके 38 बाल विवाह
चाइल्ड लाइन के मुख्य कार्यकारी दिव्यांशु चतुर्वेदी ने बताया कि बाल यौन शोषण, बालश्रम व बाल विवाह के खिलाफ संस्था की ओर से अभियान चलाया जा रहा है। अभियान के दौरान अब तक 38 बाल विवाह रोके गए हैं। शहर व ग्रामीण क्षेत्रों में अभियान चलाकर 46 बाल श्रमिक मुक्त भी कराए गए हैं। भारत-नेपाल सीमा से होकर तस्करी का ले जाए जा रहे 9 बच्चों को भी मुक्त कराया जा चुका है। इसके अलावा जिले के 50 गावों में अभियान चलाकर 50,000 से अधिक लोगों को बाल विवाह के विरुद्ध शपथ दिलाई गई है।
फैक्ट फाइल
-125 प्रतिष्ठानों पर काम करते मिले बाल श्रमिक
-72 बाल श्रमिक खतरनाक काम करते पाए गए
-79 बच्चे परचून की दुकानों पर काम करते मिले
-40 श्रमिकों का अब संवर रहा भविष्य
-1.42 लाख हर माह बच्चों को मिल रहा प्रोत्साहन
मुझे कुछ कहना है
बालश्रम कानूनों में बदलाव होने पर ही इस पर विराम लग पाएगा। सिर्फ रेस्क्यू करने और उनको होटल, ढाबों से हटाने तक बालश्रम नहीं रकेगा। इसके लिए सभी लोगों को एकजुट होकर प्रयास करना होगा।
सभाराज सिंह अधिवक्ता,
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सामाजिक जागरूकता के साथ सभी लोगों को अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना होगा। कमजोर तबके के लोगों के आर्थिक उन्नयन को लेकर शासन-प्रशासन स्तर पर भी ठोस कवायद की अभी भी जरूरत है।
विद्याकांत मिश्र, समाजसेवी,
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सिर्फ सरकार को सिर्फ कोसने से बालश्रम पर अंकुश नहीं लग पाएगा। हर व्यक्ति को बच्चों से श्रम कराने के प्रति जागरूक होना पड़ेगा। साथ ही उनके शैक्षिक उन्नयन को लेकर भी ठोस कदम उठाने होंगे।
डॉ.कौशल पांडेय,
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जब तक श्रमिकों के उत्थान को लेकर मजबूत मसौदे पर प्रशासन स्तर पर कदम नहीं उठेंगे, तब तक बालश्रम भी अंकुश नहीं लग पाएगा। क्योंकि वही बच्चे बाल श्रमिक के रूप में काम करते हैं जिनकी पारिवारिक स्थिति अच्छी नहीं होती है।
योगेंद्रमणि त्रिपाठी,
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बालश्रम रोकने को लेकर हाल के सालों में योगी सरकार की ओर से कई बेहतर कदम उठाए गए हैं। इन बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के साथ इनके अभिभावकों को योजनाओं से जोड़ने का काम हो रहा है।
शिवदयाल तिवारी,
छह से 13 साल तक के बच्चों को ही श्रम विभाग व संस्थाएं रेस्क्यू कर उनके शैक्षिक पुनर्वास की दिशा में काम कर रही हैं। लेकिन 14 साल से ऊपर किशोरों के भविष्य संवारने को लेकर कोई ठोस पहल नहीं हो रही है।
राकेश सिंह,
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बालश्रम रोकने के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हो रही है। बालश्रम कराने वाले लोगों पर कड़े कानूनी कार्रवाई का प्रावधान किया जाना चाहिए। ताकि लोगों में एक डर पैदा हो।
डॉ.फैजल,
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बाल श्रम के खिलाफ लड़ाई में महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। कुछ ऐसे तरीकों को अपनाया जाय जो बदलाव ला सकते हैं। महिलाओं को बाल श्रम उन्मूलन कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से और समान रूप से शामिल होना चाहिए। जब वे ऐसा करेंगी, तो बालश्रम की संभावना कम हो जाएगी।
अरिवंद सिंह,
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विभाग की ओर से प्रतिष्ठानों पर छापेमारी कर बच्चों को छुड़ा तो लिया जाता है, लेकिन दुकानदारों पर कार्रवाई के नाम पर चेतावनी या फिर मामूली जुर्माना ही किया जाता है। विभाग को चाहिए कि कठोर कार्रवाई करे जिससे दोबारा दुकानदार ऐसी पुनरावृत्ति न कर सके।
संजय मौर्य,
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देहात संस्था की ओर से शहर समेत ग्रामीण क्षेत्रों में बालश्रम अवमुक्त अभियान चलाया जा रहा है। होटलों, ढाबों व अन्य दुकानों पर काम करने वाले बालश्रमिकों को मुक्त कराकर बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत कर सभी कार्रवाई पूरी की जाती है। इसके बाद परिजनों के सुपुर्द कर दिया जाता है।
मनीष यादव,
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देहात इंडिया की ओर से बालश्रम उन्मूलन, बाल विवाह की रोकथाम, मानव तस्करी के खिलाफ अभियान चलाकर बच्चों को मुक्त कराया जा रहा है। बालश्रम की जानकारी होने पर कोई भी व्यक्ति चाइल्ड हेल्पलाइन को 1098 पर कॉल कर जानकारी दे सकता है। इसके बाद फौरन कार्रवाई की जाएगी।
दिव्यांशु चतुर्वेदी, मुख्य कार्यकारी देहात इंडिया
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बोले जिम्मेदार
बालश्रम रोकने के लिए जिले भर में लगातार छापेमारी की जा रही है। बालश्रम से मुक्त कराए गए बच्चों को शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ने के साथ ही उनके पुनर्वासन को लेकर लगातार कदम उठाए जा रहे हैं। इसका परिणाम है कि बालश्रम का ग्राफ गिर रहा है।
सिद्धार्थ मोदियानी, सहायक श्रमायुक्त
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सुझाव
01- वृहद स्तर पर शिक्षा का प्रसार किया जाना चाहिए।
02- गरीबों के लिए सरकार को ठोस कदम उठाना होगा जिससे बालश्रम न हो सके।
03- कड़े कानून बनाकर इसका सख्ती से पालन कराना होगा।
04- बालश्रम कम करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में वृहद स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए।
05- बालश्रम उन्मूलन में समाज के सभी वर्गों का सहयोग लेना चाहिए।
06- बाल श्रम के शिकार बच्चों को मुक्त कराने के बाद उनके परिवार की मदद करना चाहिए।
07- लोगों को चाहिए कि बाल श्रम के खिलाफ शिकायत दर्ज कराएं।
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शिकायत
01- बालश्रम कराने वाले होटल, ढाबों के संचालकों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होती है।
02- बालश्रम के खिलाफ समाज के सभी वर्गों से सहयोग नहीं लिया जाता है।
03- बालश्रम मुक्त कराने वाले बच्चों के परिवार की आर्थिक मदद अच्छे से नहीं हो पाती है।
04- ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम नहीं चलाए जा रहे हैं, जिससे ग्रामीण बच्चे काम करते हैं।
05- ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को बालश्रम के खिलाफ जागरूक नहीं किया जा रहा है।
06- बालश्रम के खिलाफ कड़े कानून नहीं बनाए जा रहे हैं।
07- कमजोर तबके के लोगों के आर्थिक उन्नयन के लिए शासन-प्रशासन ठोस कवायद नहीं करता है।
प्रस्तुति- प्रदीप तिवारी, ध्रुव शर्मा
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